कोशिश करूँगा...

नहीं मालूम कब,
एक रिश्ता तुझसे बना बैठा,
नहीं मालूम कैसे,
तुझे अपना समझ बैठा,
नहीं मालूम क्यों,
कुछ उम्मीदें तुझसे लगा बैठा,

मिजाज अच्छा रहा तो दुआएँ दे दी,
दिल दुखा तो हाय भी निकली,

मैं ये नहीं कहता के दिल तूने दुखाया,
पर उम्मीदें टूटी तो दिल टूटा,

अब तो मैं भी उलझन में हूँ,
खुदा से माँगी हैं खुशियाँ तेरी,
या निकली थी महज़ दुआएँ दिल से,
हाय निकली थी मेरे दिल से,
या कोसा था मैंने तुझको,

खैर,
दिल पे तेरे असर ना होगा,
ये मालूम है मुझे,
वक़्त और दिमाग़,
बर्बाद हो फ़िज़ूल की बातों पे,
ये भी तुझे पसंद नहीं मालूम है मुझे,

इसिलिये तो मान लेता हूँ मैं हार अपनी,
और जिता देता हूँ तुझे हर बार उन ख़यालों में,
रिश्ता बना बैठा हूँ मैं तुझसे जिन ख़यालों में,

कोशिश करूँगा,
ये आखरी हो मेरा पैग़ाम तुझको,
पर मुमकिन नहीं लगता,
रिश्ता जो निभाना है तुझसे,
बेशक हो सिर्फ मेरे ही ख़यालों में...